Saturday, January 1, 2011

Arz hai.....

यदी हाँ को इकरार समझूँ ,
तो यह शब्द मायूस क्यूँ हैं ??
खुशियों से भरी लकीरों का
तेरा चेहरा भी , मोहताज़ क्यूँ हैं ??

यदी हाँ को इन्कार समझूँ ,
तो यह बेशबब-बेरुखी क्या है ??

तुझसे ना सही ,
खुद से रुशवा हो जायेंगे
इस झूठे ऐतबार पे

वरना ता-उम्र इंतज़ार करते
तेरे
इन्कार पे !!!

1 comment:

alok said...

Tere wade pe jiye hum to yeh jaan jhut janaa, khushi se mar na jate..Agar ayetbar hota ...!!

Ghalib