Sunday, December 26, 2010

आईना .....

आईना मुझे देख के हैराँ सा गया ,
मेरी आँखों में एक नज़र डाल ,
मैं परेशां हूँ , यह भाँप गया !!!


पहले कभी जब भी मैं आता था ,
आते ही मुस्कुराता था ,
यह देख के आईना भी
नए - नए शक्ल बनाता था
हमें और भी हँसाता था !!!!!

आज जब हम रुसवा हैं इस ज़माने से ,
किसी के आशा से , तो किसी के निराशा से ,
चेहरे पे एक शिकन सी आ गई है ,
बढती उम्र के साथ ,
आखीर क्यों एक फीक्र सी आ गई है ??

इसे देख के आईना हैराँ सा गया ,
मेरी आँखों में एक नज़र डाल ,
मैं परेशां हूँ , यह भाँप गया !!!

उसे आदत थी मेरी मुस्कराहट की ,
कभी हसने की, तो कभी शरमाने की ,

यह देख के आईना भी

कुछ और नहीं तो ,
कीसी पिछली ख़ुशी पे ही मुस्कुरा दो गोया ,
बातों बातों में यह बात वह कह गया ,
खुश होने का एक बहाना बतला गया,

नए-नए शक्ल बना
फ़िर से मुझे हँसाता गया !!!!!!

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