Friday, January 7, 2011

" यह इश्क भी अजीब है गोया "

यह इश्क भी अजीब है गोया ,
खुद को भुला , किसी को पा जाती है ,
जैसे चाँद को रौशनी दिखा के अँधेरा खो जाती है

किसी के लिए जीने का मकसद ढूंड लेती है ,
तो किसी पे मरने की चाहत ,

दुरिओं का कोइ असर नहीं होता
नजदीकिय भी मिटाना चाहती है..
यह इश्क भी अजीब है गोया !!!!

बारिश की बूंदों को पकड़ , आसमां में चढ़ती है ,
तारो को सजाती हैं तो , चाँद पे झूलती है ,
कागज के नाव में भी अपना मुक्कदर देखती हैं ,
न जाने भला क्या-क्या यह सोचती हैं..
यह इश्क भी अजीब है गोया

हर चीज़ में खुदी को पा लेती है !!!

Saturday, January 1, 2011

Arz hai.....

यदी हाँ को इकरार समझूँ ,
तो यह शब्द मायूस क्यूँ हैं ??
खुशियों से भरी लकीरों का
तेरा चेहरा भी , मोहताज़ क्यूँ हैं ??

यदी हाँ को इन्कार समझूँ ,
तो यह बेशबब-बेरुखी क्या है ??

तुझसे ना सही ,
खुद से रुशवा हो जायेंगे
इस झूठे ऐतबार पे

वरना ता-उम्र इंतज़ार करते
तेरे
इन्कार पे !!!

नया साल मुबारक हो :)

देखिये पाते हैं उस्शाक बुतों से क्या फैज़,

एक ब्रह्मण ने कहा है की यह साल अच्छा है.. :)