की कुछ लिखूं या न लिखूं ??....
सफ़ेद कागज़ पे जब हमने , हमारे बीते हुए लम्हों की लिखने की सुरुवात की
असमंजस में पड़ गयें , कहीं ये गलत तो नहीं ?? ...
कहीं ये हमारी आधी- अधूरी , उलटी - पुलटी यादों को न सब्दो में सिमट दे !!!!...
अनकही बातों को जब कहने लगे , तो भावनाओ को न छुपा ले !!!...
बार बार दुहराने से जब हरबार नया से लगे ,
कहीं वो अनंत यादों को यूँ सब्दो में न भुला दें !!!!
रुक से गयें हम और सहम भी गयें ...
न लिखूं तो फिर कहूँ कैसे ??
और कहने जाऊं तो पूरी बात नहीं आती
वो एहसास नहीं आती !!!....
फीर यूँही सोचते रह गयें हम
की कुछ लिखूं या न लिखूं .......!!!!!!!! ( 16/10/2010 )